वन्य जीवों की रक्षार्थ बलिदान होने वाले वीर बीरबल

वन्य जीवों की रक्षार्थ बलिदान होने वाले वीर बीरबल

Bipinladhava


वन्य जीवों की रक्षार्थ बलिदान होने वाले वीर बीरबल 

जन्म 15 जनवरी 1940 जोधपुर 

बलिदान 17 दिसंबर 1977  मार्गशीर्ष सुद सप्तमी विक्रम संवत 2034

अमर शहीद बीरबल का जन्म 15 जनवरी 1940 में गांव लोहावट, तहसील फलौदी, जिला जोधपुर राजस्थान में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री बिड्दाराम खीचड एवं माता का नाम श्रीमती लाछां जांगु था ।

प्राथमिक स्तर तक शिक्षा ग्रहण की । बचपन में ही उनकी रुचि विश्नोई धर्म में गहन थी ।  माताजी उनको विश्नोई विरों की कहानियां सुनाया करती थी, जिन्होंने वन्य जीवों पर दया करना एवं उनकी रक्षा करना भी है । 

सहस्त्र दोय चौतीस विक्रम सम्वत बखाणिये।
मास मिंगसर रे बीच, शनि सातम जाणिये।।
शनि सातम जाणिये, बैठो गोवल मंझार।
खड़को हुयो बंदूक रो, कान पड़ी भणकार।।
उठयो बीरबल माला तजने,सुमर रहयो जगदीश।
मरियो मिरगो देख के, सही बिसवा बीस।।
विक्रम सम्वत बखाणिये।

विक्रम संवत 2034 मार्गशीर्ष सुदी सप्तमी , शनिवार को बीरबल ईश्वर के ध्यान में बैठे हुए थे । इतने में ही बंदुक का खडका हुआ । बीरबल अपनी माला बीच में ही छोड्कर खड्के की ओर दौड पडे । जब वह अपने खेत की कांकड पर पहुंचे तो वहां उन्होंने देखा, एक घायल हिरण तड्फ रहा है ।

पकड़ लियो उण वार, पापी थर थर कांपिया।
देख्यो कंध करार, हत्यारा मन हांफिया।।
हत्यारा मन हांफिया, छोड़ दियो लिगार।
गोली मारी, बुरी विचारी, पापी हुया फरार।।
हिरण बराबर सोयो धर्मी, छोड़ मोह परिवार।
बिश्नोई पूरो खरो।



पास में ही शिकारी खडे थे । बीरबल ने उन शिकारियों से हरिण लेना चाहा । क्रुर शिकारियों ने उन्हे भी गोली मार दी । ईस प्रकार वह अनोखा वीर 17 दिसंबर 1977 को शहीद हो गया । उस समय उनकी उम्र 30 वर्ष की थी ।
शहीद बीरबल अपने पिछे पत्नी, तीन पुत्रियां तथा एक पुत्र छोड गये थे । बीरबल एवं हरिण के हत्यारे को माननिय न्यायाधीश श्री राजेन्द्र सक्सेना द्वारा आजीवन कारावास व उसके सहयोगी को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा एवं जुर्माना सुनाया गया । हर वर्ष, शहीद की पुण्यतिथि पर एक शहीदी मेला लगता है । आज शहीद के समाधी-स्थल पर एक स्मारक बना हुआ है । धन्य है वह माता, जिसने ऐसे अमर शहीद को जन्म दिया

बूचे भगत सुमार, धर्म साबत राखियो।
अंत सुमर किरतार, नूण बीरबल भाखियो।।
नूण बीरबल भाखियो, चूण साथरी हेत।
जीव न मारे, रूंख न घावै बिश्नोईयां रे खेत।।
दोजग में पापी पडय़ा, सुरग गयो सुचियार।
रामकरण साखी भणे, बूचे भगत सुमार।।



शत शत नमन वंदे मातरम् जय हिंद

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