9 नवंबर 1947 जुनागढ स्वतंत्रता दिवस

9 नवंबर 1947 जुनागढ स्वतंत्रता दिवस

Bipinladhava

9 नवंबर 1947 

जुनागढ स्वतंत्रता दिवस 

वैसे तो हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, लेकिन गुजरात के जूनागढ़ में आजादी के बाद भी मातम का माहौल था। यहां के लोग दहशत में थे कि जूनागढ़ कहीं पाकिस्तान का हिस्सा न हो जाए। 

15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, उस समय भी देश की तीन ऐसी रियासतें थीं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था। ये रियासतें थीं जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और गुजरात का जूनागढ़। 

जूनागढ़ की बात की जाए तो इस समय मुस्लिम लीग के कट्टर समर्थक शहनवाज भुट्टो जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की अंदर ही अंदर पूरी तैयारी कर चुके थे। इस समय जूनागढ़ के नवाब मोहम्मद महाबत खान थे। 

इसी बीच लौहपुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल ने मोर्चा संभाल लिया और जूनागढ़ को भारत का हिस्सा बनाकर ही दम लिया

जूनागढ़ का नवाब नवाब मोहम्मद महाबत पाकिस्तान भाग निकला और  9 नवंबर 1947 को जूनागढ़, भारत का हिस्सा घोषित कर दिया गया। इसीलिए 9 नवंबर को पाकिस्तान में 'ब्लैक डे' माना जाता है, जबकि इस दिन गुजरात में खुशियां मनाई जाती हैं। इसका पूरा श्रेय भी सरदार पटेल को ही जाता है।

इतिहासकारों की मानें तो शहनावाज भुट्टो ने जूनागढ़ के नवाब मुहम्मद महाबत को अपने झांसे में पूरी तरह ले भी लिया था। इतना ही नहीं, 15 अगस्त 1947 को शहनावाज ने जूनागढ़ का पाकिस्तान के साथ जुड़ने वाला एलान भी करा दिया था। जब अखबारों में यह खबर प्रकाशित हुई तो जूनागढ़ की जनता भड़क उठी। वहीं, सरदार पटेल ने भी जूनागढ़ के लिए कमर कस ली।
सरदार पटेल ने नवाब से यह भी कहा कि जूनागढ़ को भारत का हिस्सा बनाने में सहयोग करें। इसके एवज में उन्हें यहां सम्माननीय पद भी दिया जाएगा। लेकिन नवाब महाबत अपनी जिद पर अड़ा रहा। 

इस समय तक जूनागढ़ की जनता में भी आक्रोश चरम पर पहुंच गया था। जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल न होने देने के लिए एक बार फिर से स्वतंत्रता सेनानी खड़े हो गए। 
 
25 सितंबर 1947 को मुंबई में स्वतंत्रता सेनानियों के नेताओं की एक बैठक हुई, जिसमें जूनागढ़ की आजादी के लिए आरजी हुकुमत नामक एक जन आंदोलन शुरू करने की योजना बनाई गई। इस आंदोलन की घोषणा होते ही स्वतंत्रता सेनानियों ने जूनागढ़ रियासत के मुख्य गांवों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। इसी का नतीजा यह रहा कि आरजी हुकुमत ने 2 नवंबर तक जूनागढ़ राज्य के 36 गांवों पर कब्जा कर लिया था। इससे जूनागढ़ के नवाबी शासन की नींव हिल गई। अब जूनागढ़ के लोगों को आशा की किरण दिखाई देने लगी थी।

स्वतंत्रता सेनानियों के बढ़ते कदमों को देखकर नवाब मोहम्मद महाबत समझ गया था कि अब उसके हाथों से जूनागढ़ की रियासत निकल चुकी है और अब तो उसे अपनी जान बचाकर भागने का मौका ढूंढना था। सरदार पटेल ने भी नवाब को जूनागढ़ से भाग जाने की सलाह दी। स्वतंत्रता सेनानियों और जूनागढ़ की जनता के आक्रोश को देखते हुए नवाब चुपके से 24 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान भाग निकला।



नवाब को पाकिस्तान भाग जाने के बाद उसकी छवि खलनायक की तरह हो गई। जबकि वास्तविकता यह है कि नवाब मोहम्मद महाबत ने अपने शासनकाल मे जूनागढ़ के लिए सराहनीय विकास कार्य किए। महाबत ही एक ऐसा नवाब था, जिसने शेरों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया।

इतिहासकारों के अनुसार नवाब को पाकिस्तान जाकर अपनी गलती का अहसास हुआ था। इतना ही नहीं, नवाब ने पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चचुक्त श्रीप्रकाश से मुलाकात कर उन्हें बताया था कि वह वापस जूनागढ़ जाना चाहता है। हालांकि नवाब के लिए अब काफी देर हो चुकी थी। अगर उसने आजादी के ही दिन जूनागढ़ रियासत को भारत का हिस्सा घोषित कर दिया होता तो ताउम्र उसके नाम का डंका जूनागढ़ रियासत में बजता।

आज जूनागढ़ गुजरात का एक जिला है, जबकि तत्कालीन जूनागढ़ रियासत के कुछ हिस्से आसपास के कई और नए जिलों के अब हिस्सा बन चुके हैं। नवाबी शासन की यादें पुरानी इमारतों और संग्रहालयों का हिस्सा बन चुकी हैं। हालांकि इन मशहूर इमारतों में से कई के नाम भी बदल चुके हैं।

अगर सरदार पटेल ने समय रहते जूनागढ़ के लिए अथक प्रयास नहीं किए होते तो शायद गुजरात का यह खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर पाकिस्तान का हिस्सा होता।

वंदे मातरम् जय हिंद
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