8 नवंबर 1857 से लेकर 7 दिसंबर 1858 के दौरान मेवात के सैंकडों गांवों में अंग्रेजों ने जमकर खून की होली खेली।
इस दौरान केवल हरियाणा के मेवात इलाके के करीब 10 हजार बहादुरों ने अपना खून बहाकर भारत मां की इज्जत बचाने के लिये शहीद हो गये थे वहीं 19 नवंबर 1857 को गांव रूपडाका के 425 बहादुर वीरगति को प्राप्त हुऐ थे।
10 मई 1857 को ही चांदखां नामक मेवाती सैनिक ने अंग्रेजों पर गोंलिया बरसाकर अपनी देशक्ति का सबूत देकर सपूर्ण आजादी का अलख जगा दिया जिसकी आग पूरे भारतवर्ष में फैल गई थी।
मेवात के इतिहास पर करीब दस किताब लिख चुके सद्दीक मेव का कहना है कि पहले संग्राम में देश के जांबाजों में आपसी तालमेल न होने तथा देश के गद्दार लोगों की वजह से अंग्रेजों ने दुबारा से दिल्ली पर 20 सितंबर 1857 को अपना अधिकार जमा लिया था।
देश की पहली आजादी की क्रांति में अंग्रेजो का सबसे ज्यादा नुकसान मेवातियों ने ही किया था। इसी वजह से दुबारा से दिल्ली पर अपना अधिकार जमाने के बाद अंग्रेजों ने मेवातियों का नामोंनिशान मिटाने के लिये हर हथकंडे अपनाये।
दिल्ली के नजदीक होने के कारण अंग्रेजों को सबसे ज्याद खतरा केवल मेवातियों से ही था। तेरह महिने के इस खूनी तांडव के लिये अंग्रेजों ने अपने सबसे निपुण और क्रूरता के लिये माने जाने वाले अपने फोजी अफसरान सावर्ज, डूमंड, हडसन, के प्टन रामसे, किली फोर्ड, होर्सेज, लेटिनेंट रांगटन को भारी फौज और गोला बारूद, तोपखानों के साथ मेवात भेजा गया।
19 नवंबर 1857 को मेवात के बहादुरों को कुचलने के लिये बिग्रेडियर जनरल स्वराज, गुडगावं रेंज के सहउपायुक्त कली फोर्ड और कॅप्टन डूमंड के नेतृत्व में टोहाना, जींद बलाटिनों अलावा भारी तोपखाना सेनिकों के साथ मेवात के रूपडाका, कोट, चिल्ली, मालपुरी पर जबरजस्त हमला बोल दिया। इस दिन अकेले गांव घासेडा के 425 मेवाती बहादुरों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया।
अंगेजों की इस दमनकारी योजना का कहर पूरे 13 महिने तक चला इस दौरान अंगेजों ने 8 नवंबर 1857 को घासेडा में 157, 19 नवंबर को रूपडाका में 425 , 1 जनवरी 1858 को होडल गढी में किशन सिंह और किशन लाल जाठ सहित 85, 2 जनवरी को हसनपुर में चांद खां, रहीम खां, 6 जनवरी को सहसोला में फिरोजखा मेव सहित 12, बडका में खुशी खां मेव सहित 30, नूंह में 18, ताऊडू में 19, जनवरी 8 को महूं तिगांव में बदरूदीन सहित 73 वीरगति हुए थे।
इसी तरह 9 फरवरी 1858 में अडबर, नंगली के धनसिंह मेव सहित 52 लोगों को पेडों पर लटकाकर फांसी दे दी गई थी। 13 फरवरी को गांव कोडल, गहलब और अहरवा में 85 को, 16 फरवरी को गांव तुसैनी के मलूका नंबरदार सहित उसके परिवार के 11 सदस्य और 22 फरवरी को आकेडा के हस्ती सहित 3 लोगों को वीरगति कर दिया गया।
मार्च 1858 में अंग्रेजों ने मेवात के गावं घाघस, कंसाली, सेल, नगीना, पुन्हाना, फिरोजपुर झिरका, मांडीखेडा, बल्लभगढ में जमकर कहर बरपाया इसमें 24 मार्च को पुन्हाना के घीरी मेव सहित 283 और 29 मार्च को गांव घाघस कंसाली में गरीबा मेव सहित 61, सेल गांव में हननु सहित 5, फिरोजपुर झिरका में इसराईल, केवल खां सहित 24, मांडीखेडा, नगीना में उदय सिंह, शावंत सहित 91 बल्लागढ में 35 सहित सैंकडों को वीरगति कर दिया गया।
कुछ गद्दारों ने दिल्ली में सूचना भिजवाई कि हजारों मेवाती हथियारों के साथ गांव पिनगवां, महूं, बाजीदपुर और सोहना में मौजूद हैं। अंग्रेजो ने मेवातियों के समंभलने से पहले ही इन गावों पर भारी तोपखाने के साथ हमला बोल दिया। 27 नवंबर 1858 को कस्बा पिनगवां में 27 और महूं के सदरूदीन सहित आसपास के 170 को शहीद कर दिया गया। 7 दिसंबर को बाजीदपुर के आसपास के 161 और सोहना के 34 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
अखिल भारतीय शहीदाने मेवात सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरफूदीन मेवाती का कहना है कि सरकार को चाहिये की 1857 के हजारों गुमशुदा शहीदों को निकाला जाये और सभी शहीदों की याद में सा गावों में शहीदी मिनार बनाई जायें और मेवात के स्कूलों और सडको का नामकरण उन शहीदों के नाम से किया जाये जिससे आने वाली नसलें उन बहादुरों से प्रेरणा ले सकें।
शत शत नमन बलिदानीओ को वंदे मातरम् जय जवान जय हिंद