भूरा सिंह वाल्मीकि

भूरा सिंह वाल्मीकि

Bipinladhava

भूरा सिंह वाल्मीकि 

बलिदान 9 जनवरी 1858 फांसी चांदनी चौक दिल्ली 

देश की आज़ादी के लिए सन 1857 की क्रांति में अपनी अहम भूमिका निभा हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूलने वाले अमर शहीद भूरा सिंह वाल्मीकि

हरियाणा राज्य के जिला फरीदाबाद में आज जो बल्लबगढ़ शहर है वो 1857 में बल्लबगढ़ रियासत हुआ करती थी। इस रियासत के राजा नाहर सिंह थे और भूरा सिंह वाल्मीकि राजा की सेना में एक टुकड़ी के कमांडर थे। भूरा सिंह वाल्मीकि बहुत बलशाली, युद्ध कला में निपुण व इमानदार और देशभक्ति से ओतप्रोत थे। वो राजा के बहुत विश्वाशपात्र साथी थे इसी कारण राजा जब कहीं बाहर जाते तो भूरा सिंह जी को अपने अंगरक्षक के तौर पर हमेशा अपने साथ रखते थे। राजा अपने राज्य के अहम फैंसले भूरा सिंह जी से सलाह मशविरा लेकर किया करते थे। 

जब अंग्रेजी हुकूमत ने राजा नाहर सिंह जी को फरमान भेजा कि हमने दिल्ली के आखरी शासक बहादुरशाह जफर के साथ सन्धि कर ली है और हम आपसे भी सन्धि वार्ता करना चाहते हैं इसलिए आप हमारे साथ सन्धिवार्ता में शामिल हों। तब राजा नाहर सिंह जी ने खतरे को भाँपकर अपने करीबी विश्वाशपात्र साथी गुलाब सिंह सैनी जी(सेनापति) भूरा सिंह वाल्मीकि जी(अंगरक्षक) खुशाल सिंह जी(उपसेनापति) को साथ लेकर दिल्ली पहुँचे।



वहाँ राजा नाहर सिंह जी के साथ धोखा हुआ और अंग्रेजों के द्वारा राजा व उनके तीनों साथयों (गुलाब सिंह जी, भूरा सिंह वाल्मीकि जी, खुशहाल सिंह जी)को दिल्ली लाल किले के अंदर नज़रबन्द कर दिया गया। उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने इन चारों को फाँसी का ऐलान कर दिया। 

9 जनवरी 1858 को दिल्ली चाँदनी चौक पर जब चारों को फाँसी के लिए लाया गया तो सबसे पहले फाँसी गुलाब सिंह सैनी सेनापति को दी गयी उसके बाद जब राजा नाहर सिंह जी को फाँसी देने की बारी आई तो "भूरा सिंह वाल्मीकि जी" अंग्रेजी सैनिकों के सामने डट कर खड़े हो गए और अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए कहा कि इस समय मैं राजा का अंगरक्षक हुँ और अंगरक्षक होने के नाते मैं अपनी आँखों के सामने अपने राजा को फाँसी लगता नहीं देख सकता, इसके लिए मेरा फ़र्ज़ गवाही नहीं देता। इसलिए राजा से पहले फाँसी मुझे लगाई जाए। 

इतना कहकर देश के वीर सपूत "भूरा सिंह वाल्मीकि" अपनी दिलेरी और देशभक्ति का परिचय देते हुए 9 जनवरी 1858 को देश पर कुर्बान हो गए। उनके बाद राजा नाहर सिंह और खुशहाल सिंह जी को फाँसी दी गयी। 

लेकिन ये अमर बलिदानी आज भी अपनी पहचान की बाट जोह रहा है। 

शत शत नमन वंदे मातरम् जय हिंद
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