संथाल विद्रोह 1855 और यादव योद्धा

संथाल विद्रोह 1855 और यादव योद्धा

Bipinladhava


संथाल विद्रोह 1855 और यादव योद्धा

संथाल एक जनजाति है, जो मुख्य रूप से संथाल परगना प्रमंडल एवं पश्चिमी व पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग, रामगढ़, धनबाद तथा गिरीडीह जिलों में निवास करती है। इसकी कुछ आबादी बिहार राज्य के भागलपुर पूर्णिया, सहरसा तथा मुंगेर प्रमंडल में भी पायी जाती थी। संथाल जनजाति पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, मध्यप्रदेश तथा असम राज्यों में भी वास करती है। इस जनजाति को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के साओत क्षेत्र में लंबे अर्से तक रहने के कारण साओंतर कहा जाता।



विद्रोह का कारण

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था। स्थायी बंदोबस्त  के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को “दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया,।संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

विद्रोह का आरंभ

1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे – सि द् धू, का न्हू, चाँ द और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया.।
30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए।
जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया.।
जिस जिस राज्य में संथाल रहते थे सभी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंगे ऐलना कर दिया
विद्रोह की लपट बिहार के भागलपुर भी पहुची वहां संथालो के साथ देने के लिए यादव भी तैयार खड़े हुए थे।

संथाल विद्रोह में यादवो का प्रवेश

सबसे प्राचीन स्वतंत्र योधा जाती यादव भी इस बिद्रोह से अछूती नही रहे किसी के साथ अन्याय हो औऱ यदुवंश देखत्ता रह जाये ये तो नामुमकिन है दादा कृषन का लहू उबाल जो मारने लगता है हुआ भी वही,। कहते है न जहा मैटर बड़े होते यादव वही खड़े होते है।
संथाल बिद्रोह बिहार के भागलपुर में जोर पकड़ने लगा औऱ यादव भी इस बिद्रोह में शामिल थे संथाल और यादव ब्रिटिश सरकार पर कहर बन के टूटे
भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई.,,थानों को आग के हवाले किये जाने लगा कई सरकारी कर्मचारियो ,साहुकार, लालची ज़मीदारो की हत्या कर दी गयी।।

आगे की लड़ाई जारी रखने के लिये बिद्रोहियो औऱ धन बल की आवसकता महसुस हुआ ।पर अंग्रेजों के डर से कोई भी आगे आने को तैयार नही था।तब भागलपुर के बड़े ज़मीदार प्रताप यादव ने साथ दिया।
प्रताप यादव भागलपुर के बड़े धनी ज़मीदार थे । साना किस्कू जो कि एक संथाल था ,और बिद्रोह में शामिल था, वो प्रताप यादव के यहा काम करता था,
उसने विद्रोहियो को अपने मालिक प्रताप यादव के यहां चलने को कहा।

प्रताप यादव ने पहले सभी की बात सुनी समझी और कहा ठीक है लड़ाई ठीक है
और कहते है प्रताप यादव ने अपने 200 बेहतरीन यदुवंसी योधा भी बिद्रोह में शामिल किए । प्रताप यादव धन, बल ,चिकित्सा हर वो चीज उपलब्ध  कराई जो विद्रोहीयो को चहिये थी,
अब संथाल बिद्रोह बड़े पैमाने पर घातक होते जा रहा था।ब्रिटिश सरकार किसी भी कीमत पर ये बिद्रोह खत्म करना चाहती थी।

बिद्रोह का क्रूरतापूर्ण दमन

ब्रिटिश सरकार संथाल विद्रोहियों की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल विद्रोहियों  के पास अधिक शक्ति नहीं बची  थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी अब नहीं थे. ।

अंग्रेजो के अत्याधुनिक हथियारों के आगे भला कब तक संथाल बिद्रोही भला टिकेते फिर भी जो जोश जज्बा उन्होंने दिखाया था उसने अंग्रेजो की नींद हराम कर दी।। अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल बिद्रोही अंग्रेज सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथाल बिद्रोहयी का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. आते तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion)  खत्म कर दिया गया।

यादवों और संथालो को क्रिमिनल कास्ट घोसित किया गया औऱ इसकी वजह उनकी बुनियादी सुविधा भी जाति रही।

इतना बड़ा बिद्रोह जिसमे हजारों की तादाद में यादव मारे गये उनके योगदान को भुला दिया गया ,पर वो मर के भी अमर आजाद है।

जय यादव जय माधव वंदे मातरम् जय हिंद
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