सरदार करतार सिंह सराभा

सरदार करतार सिंह सराभा

Bipinladhava


सरदार करतार सिंह सराभा

जन्म 24 मई 1896 लुधियाना , पंजाब

बलिदान 16 नवंबर 1915 फांसी

सरदार करतार सिंह सराभा भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में से एक थे। उन्हें अपने शौर्य, साहस, त्याग एवं बलिदान के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। महाभारत के युद्ध में जिस प्रकार वीर अभिमन्यु ने किशोरावस्था में ही कर्तव्य का पालन करते हुए मृत्यु का आलिंगन किया था, उसी प्रकार सराभा ने भी अभिमन्यु की भाँति केवल उन्नीस वर्ष की आयु में ही हँसते-हँसते देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। उनके शौर्य एवं बलिदान की मार्मिक गाथा आज भी भारतीयों को प्रेरणा देती है और देती रहेगी। यदि आज के युवक सराभा के बताये हुए मार्ग पर चलें, तो न केवल अपना, अपितु देश का मस्तक भी ऊँचा कर सकते हैं।

साहस की प्रतिमूर्ति

करतार सिंह सराभा साहस की प्रतिमूर्ति थे। देश की आज़ादी से सम्बन्धित किसी भी कार्य में वे हमेशा आगे रहते थे। 25 मार्च 1913 में ओरेगन प्रान्त में भारतीयों की एक बहुत बड़ी सभा हुई, जिसके मुख्य वक्ता लाला हरदयाल थे। उन्होंने सभा में भाषण देते हुए कहा था, "मुझे ऐसे युवकों की आवश्यकता है, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दे सकें।" इस पर सर्वप्रथम करतार सिंह सराभा ने उठकर अपने आपको प्रस्तुत किया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच लाला हरदयाल ने सराभा को अपने गले से लगा लिया।



मुकदमा

करतार सिंह सराभा पर हत्या, डाका, शासन को उलटने का अभियोग लगाकर 'लाहौर षड़यन्त्र' के नाम से मुकदमा चलाया गया। उनके साथ 63 दूसरे आदमियों पर भी मुकदमा चलाया गया था। सराभा ने अदालत में अपने अपराध को स्वीकार करते हुए ये शब्द कहे, "मैं भारत में क्रांति लाने का समर्थक हूँ और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमेरिका से यहाँ आया हूँ। यदि मुझे मृत्युदंड दिया जायेगा, तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूँगा, क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार मेरा जन्म फिर से भारत में होगा और मैं मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए काम कर सकूँगा।" जज ने उन 63 व्यक्तियों में से 24 को फाँसी की सज़ा सुनाई। जब इसके विरुद्ध अपील की गई, तो सात व्यक्तियों की फाँसी की सज़ा पूर्ववत् रखी गई थी। उन सात व्यक्तियों के नाम थे- करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले, काशीराम, जगतसिंह, हरिनाम सिंह, सज्जन सिंह एवं बख्शीश सिंह। फाँसी पर झूलने से पूर्व सराभा ने यह शब्द कहे-

हे भगवान मेरी यह प्रार्थना है कि मैं भारत में उस समय तक जन्म लेता रहूँ, जब तक कि मेरा देश स्वतंत्र न हो जाये।

फाँसी

16 नवम्बर 1915 को सराभा हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गये। जज ने उनके मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए कहा था, "इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिन्दुस्तान तक अंग्रेज़ शासन को उलटने का प्रयास किया। इसे जब और जहाँ भी अवसर मिला, अंग्रेज़ों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न किया। इसकी अवस्था बहुत कम है, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के लिए बड़ा भयानक है।

ऐसे वीर सपूतो को कोटि कोटि वंदन

जय हिंद वंदे मातरम्
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