कूका आंदोलन शुरुआत 5 अगस्त 1863
15 अगस्त 1871 को अमृतसर के रामबाग स्थित वटवृक्ष से लटकाकर, मंगल सिंह, मस्तान सिंह एवं गुरमुख सिंह को सरेआम फांसी
26 नवंबर 1871 को लुधियाना सेन्ट्रल जेल के बाहर सूबेदार ज्ञान सिंह, रतन सिंह एवं वतन सिंह को फांसी
बिना मुकदमा चलाये 65 क्रांतिकारियों को तोपों से उड़ा दिया गया एवं एक बारह वर्षीय बालक बिशन सिंह को तलवार से काट डाला गया !
यह विद्रोह पंजाब में हुआ था. शुरू में तो यह एक धार्मिंक आन्दोलन था, जो जल्द ही एक राजनैतिक विद्रोह में तब्दील हो गया. इसे पहले आज़ादी के विद्रोह में हमारे बहादुर जवानों ने अंग्रेजों का ठीक बैंड बजाया था. इस आन्दोलन में हमारे कई वीर सैनानी शहीद हो गए थे , इस आन्दोलन से एक बात तो स्पष्ट हो गयी थी, की अँगरेज़ बहुत बड़े डरपोक थे. इस आन्दोलन का पूरा श्रेय सतगुरु राम सिंह जी को जाता है !
कहते है कि अँगरेज़ तो उनके नाम से भी डरते थे. मज़े की बात तो यह है की अँगरेज़ इतना डरते थे इन बहादुर सेनान्निन्यों से, की डर के मारे उन्होंने उनका नाम “ CROOKS “ रख दिया था. अंग्रेजों ने अपने रिकॉर्ड में नामधारी स्वतंत्रता संग्रामियों को कूका लिखा. इसीलिए इतिहास में इस आंदोलन का नाम पड़ा “कूका आन्दोलन” !
ईस्ट इंडिया कंपनी के इरादे तो शुरू से ही गंदे थे , जब वह भारत आये तो उन्होंने यह पूरी कोशिश करी की उनकी धाक हर कोने में हो. इस कोशिश में उन्हें पंजाब में कई बार मूँह की खानी पड़ी. ईस्ट इंडिया कम्पनी इस ताक में भी थी, कि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों को ईसाई बनाये. जब कुका आन्दोलन के सदस्यों को इस बात का पता चला, तो उन्हें बहुत बुरा लगा. एक बार जब इस आन्दोलन के लोगों को यह पता चल कि कुछ अंग्रेज हिन्दुओं के सामने ही गाय काटने के लिए ले जा रहे हैं तो कुछ ही गिनती के लोगों ने अंग्रेजों की पूरी बटालियन को मिट्टी में मिला दिया था !
यह आन्दोलन शुरू में धार्मिक था, और यह हमें सर्वप्रथम 5 अगस्त 1863 को सियालकोट के डिप्टी कमिश्नर की रपट से पता चल पाया था. शुरू में बाबा राम सिंह पंजाब में धर्म के अन्दर सुधार की मांग कर रहे थे. इस रिपोर्ट की माने तो बाबा राम सिंह आजादी के लिए लड़ रहे थे. हर नामधारी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा था. लुधियाना के डी.आई.जी. मैकेन्ड्रयू एवं अम्बाला के कमिश्नर जे.डब्ल्यू मैकनाब ने अपनी 4 नवम्बर 1867 की रपट में “कूका आन्दोलन” को ब्रिटिश सल्तनत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताकर तत्काल सत गुरु राम सिंह जी सहित सभी सहयोगियों को गिरफ्तार करने की दरखास्त तक कर दी थी !
उन्होंने नामधारी जत्थेबंदी को गैरकानूनी घोषित करने की सिफारिश भी की थी , कुछ इतिहास की पुस्तकें में आप लिखा पाएंगे, कि जब बाबा के 150 अनुयायी अंग्रेजों से आखरी टक्कर लेने के लिए बढ़ रहे थे तो इनको रोकने की कोशिश बाबाने की थी. लेकिन इन 150 लोगों के पीछे 5 हजार जानें ना जाएँ इसलिए बाबा ने विद्रोह करने की अनुमति दी थी , सन् 1870 तक कूका आन्दोलन एक बड़े विद्रोह का रूप ले चुका था. अंग्रेज अब नामधारी कूका के लोगों से डरने लगे थे. आन्दोलान्कर्ताओं का सिर्फ और सिर्फ एक मकसद था और वह था आजादी. अब वे गोहत्या का सख्त विरोध सामने आकर करने लगे थे. अंग्रेजों को यह बात एकदम नागवारा थी, और इस विद्रोह को खत्म करने की पूरी कोशिश होने लगी !
अंग्रेजों ने नामधारियों को पकड़ना शुरू कर दिया. और बहोतों को आजीवन कारावास की सजा दी गई.अनेक को काला पानी (अंडमान) भेज दिया गया और अनगिनत नामधारियों को गहरे सागर में डुबो दिया गया , 30 जुलाई 1871 को चार नामधारियों को “सरेआम फांसी” की सजा सुनाई गई !
15 अगस्त 1871 को अमृतसर के रामबाग स्थित वटवृक्ष से लटकाकर, मंगल सिंह, मस्तान सिंह एवं गुरमुख सिंह को सरेआम फांसी दी गई. 26 नवम्बर 1871 को लुधियाना सेन्ट्रल जेल के बाहर सूबेदार ज्ञान सिंह, रतन सिंह एवं वतन सिंह को फांसी दी गई , बिना मुकदमा चलाये 65 क्रांतिकारियों को तोपों से उड़ा दिया गया एवं एक बारह वर्षीय बालक बिशन सिंह को तलवार से काट डाला गया !
इसके बाद गुरु राम सिंह जी को रंगून एवं उसके बाद मरगोई के बीहड़ जंगलों में नजरबंद रखा गया था , भगत सिंह ने भी अपने दो लेखों में बाबा राम सिंह और उनके अनुयायियों की वीरता का जिक्र किया था. कूका आन्दोलन तो आजादी की एक सच्ची लड़ाई थी, परन्तु हमारे युवा इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते , सही मान्यों में यह आज़ादी जादी का प्रथम विद्रोह था!
शत शत नमन शुरवीरो को
वंदे मातरम जय हिन्द