राव तुलाराम यादव

राव तुलाराम यादव

Bipinladhava

राव तुलाराम यादव  

जन्म 9 दिसंबर 1825 रेवाड़ी हरियाणा 

बलिदान 23 सितंबर 1863 काबुल 

1857 की क्रान्ति के महानायक , यदुकुल भूषण , शेर ए अहीरवाल

'राव तुलाराम' हरियाणा प्रदेश के 'राज्य नायक' थे । उनके सम्मान में सड़क, अस्पताल, विद्यालयो तथा महाविद्यालयों की स्थापना की गयी। 23 सितम्बर 2001 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक-टिकट जारी किया।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और हरियाणा विधान सभा के पहले स्पीकर रहे 'राव बिरेन्द्र सिंह जी' राव तुलाराम के ही प्रपौत्र है , 'राव तुलाराम जी' हरियाणा के 'अहीर' शासक थे।

राव तुलाराम का जन्म 9 दिसम्बर 1825 को हरियाणा के विख्यात रॉयल 'राव परिवार' में हुआ था। इनके पिता 'राव पूरण सिंह' रेवाडी के राजा थे। इनकी माता का नाम 'ज्ञान कौर' था जो राजा 'राव ज़ाहरी सिंह' की पुत्री थी। उनकी शिक्षा-दीक्षा उस समय के अनुसार प्रसिद्ध गुरूओ की देख-रेख में हुयी। 'राव तुलाराम' हिंदी, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के विद्वान् थे।



नवम्बर 1839 मे अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् मात्र 14 साल की उम्र में ही 'राव तुलाराम' रेवाडी के सत्रहवे 'अहीर' शासक बने।

1857 की क्रांति के दौरान राव तुलाराम ने रेवाण क्षेत्र की कमान संभाली। इसके पीछे भी एक रोचक वाकया है। 1857 तक अंग्रेजो ने लगभग पूरे भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। पड़ोस के राजपूत राजाओ ने भी अपने हथियार डाल दिए थे और अंग्रेजों से संधि कर ली थी। हरियाणा का 'अहिरवाल' क्षेत्र अभी भी अंग्रेजों की दास्तान से मुक्त था। उसकी वजह थी इस क्षेत्र के 'अहीर' राजाओ की एक-जुटता। राव तुलाराम और उनके भाई 'राव गोपाल देव' और उनके प्रति प्रजा की निष्ठां की वजह से अँग्रेज उनकी तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखते थे। उस समय उनकी सेना में एक नारा गूंजता था 'अहीर बलवान, जय भगवान्' ! 

अहीरों के पराक्रम से अंग्रेजो के पसीने छूटने लगते थे।एक बार रेवाडी की सीमा के पास कुछ अँग्रेज सिपाहियों ने एक मोर को मार दिया। श्रीकृष्ण भक्त 'राव तुला राम' अपने यदुवंशी पूर्वजों की तरह ही मोर पक्षी से बहुत प्यार करते थे। इस घटना से राव तुलाराम तिलमिला उठे और अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया। इस युद्ध में अंग्रेजो ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। क्यूंकि इस क्षेत्र पर अधिकार करने के बाद उनका पूरे भारत पर एकाधिकार हो जाता। 'अहीरों' की फ़ौज ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया। 

इसी बीच अंग्रेजो ने राव तुलाराम के पास एक प्रस्ताव भेजा कि कुछ राजपूतों की तरह ही संधि कर ले, लेकिन राव तुला राम ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने अंग्रेजो को अपना सन्देश भेजा कि 'वो आखिरी सांस तक दास्ता को स्वीकार नहीं करेंगे' !

1 नवम्बर 1858 को संख्या बल काफी कम हो जाने की वजह से राव तुलाराम को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने तात्या टोपे और मराठों के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई को जारी रखी। बाद में 1862 में राव तुलाराम ईरान चले गये। उनकी योजना फिर से सेना तैयार करके वापस भारत आने की थी।रूस के ज़ार परिवार और अफ़ग़ानिस्तान के शासकों से राव तुलाराम की अच्छी मित्रता थी। वहां से वो काबुल आये। पर शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। 23 सितम्बर 1863 को 38 साल की उम्र में राव तुलाराम की मृत्यु 'काबुल' में हो गयी।

शत शत नमन वंदे मातरम् जय हिन्द
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