ज्योतिर्मयी गांगुली
जन्म 1889 कोलकाता
बलिदान 22 नवंबर 1945 कोलकाता
भारत की स्वाधीनता के यज्ञ में अपनी प्राणाहुति देने वाली कुमारी ज्योतिर्मयी गांगुली का जन्म 1889 में कोलकाता के एक धनी व्यक्ति श्री द्वारकानाथ जी के घर में हुआ था। उनके आग्नेय भाषण श्रोताओं के हृदय को आंदोलित कर देते थे। इस कारण शासन भी उनसे थर्राता था।
स्वाधीनता संग्राम के दौरान जब भी कोई आंदोलन या अभियान होता, वे सबसे आगे बढ़कर उसमें भाग लेती थीं। 1921 का असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे कई बार जेल गयीं।
ज्योतिर्मयी अपने भाषण में पुलिस वालों का स्वाभिमान जगाने का प्रयास भी करती थीं, पर पुलिस वाले सिर झुका कर रह जाते थे। उनके जीवन की एकमात्र प्राथमिकता देश की स्वाधीनता थी। उसकी प्राप्ति तक उन्होंने अविवाहित रहने का निर्णय लिया तथा अपनी सरकारी नौकरी भी छोड़ दी।
ज्योतिर्मयी गांगुली के पास एक विशेष प्रकार की कार थी। उसके रूप, रंग और हार्न को पुलिस वाले खूब पहचानते थे। जैसे ही उन्हें कहीं आंदोलन या सत्याग्रहियों पर होने वाले अत्याचार की सूचना मिलती, वे अपनी कार में बैठकर वहां पहुंच जाती थीं। इससे आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ जाता था, जबकि पुलिस वाले हतोत्साहित होकर पीछे हट जाते थे।
ज्योतिर्मयी जहां एक ओर कांग्रेस द्वारा निर्देशित आंदोलन में सक्रिय रहती थीं, तो दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज का निर्माण और अंग्रेजों के विरुद्ध किया जा रहा संघर्ष भी उन्हें बहुत प्रेरणा देता था। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब आजाद हिन्द फौज के सैनिकों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया, तो इसके विरोध में उन्होंने 21 नवंबर 1945 को कोलकाता में छात्रों के विशाल जुलूस का नेतृत्व किया।
यह जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था; लेकिन एस्प्लेनेड रोड पर पहुंचते ही पुलिस ने उसे रोक लिया। आंदोलनकारियों और पुलिस में काफी देर तक तीखी बहस हुई, पर पुलिस ने जुलूस को आगे नहीं बढ़ने दिया। इस पर युवक भी क्रोधित एवं उग्र हो गये। अंततः पुलिस ने गोली चला दी, जिससे रामेश्वर बनर्जी नामक युवक की वहीं मृत्यु हो गयी।
अब छात्र अपने उस बलिदानी साथी की शवयात्रा निकालने पर अड़ गये, पर पुलिस इसकी अनुमति देने को तैयार नहीं थी। रात के दो बज गये, पर कोई पक्ष पीछे नहीं हटा। मध्यस्थता के लिए डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और गवर्नर भी आये; पर बात नहीं बनी। देर होती देख पुलिस ने फिर गोली चला दी। इस बार 36 छात्र बलिदान हुए। इसके बावजूद छात्र वहीं डटे रहेे। अंततः शासन को सद्बुद्धि आयी और उसने सभी 36 युवाओं की सामूहिक शवयात्रा अगले दिन निकालने की अनुमति दे दी।
22 नवंबर को शवयात्रा में भाग लेने के लिए ज्योतिर्मयी अपनी कार से जा रही थी। यह देखकर एक पुलिस अधिकारी ने अपनी लारी को तेज गति से चलाते हुए उनकी कार को कुचल दिया। ज्योतिर्मयी गांगुली को भीषण चोट आयी। लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, पर वे बच नहीं सकी।
अगले दिन ज्योतिर्मयी की शवयात्रा में पहले दिन से भी अधिक लोगों ने भाग लेकर उस तेजस्वी नारी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
शत शत नमन वंदे मातरम् जय माताजी जय हिंद