18 नवंबर 1962
सिर्फ 123 योद्धा ने भारत-चाइना 1962 के युद्ध मे 18 नवम्बर के दिन चाइना के 1700 जवानो को मारा था , ओर 123 मे से 114 यादव थे !
ओर दूनिया के इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ जब किसी दुश्मन देश ने किसी दुश्मन के सैनिको को इतना सनमान दिया हो, क्यों की चाइना ने तब हमारे इस वीरो को कफन ओढा के सम्मानित किया ओर कफन पे चाइना ने लिखा द ब्रावेस्ट ओफ द ब्राव !
तब मारत की सभी रेजिमेंट चाइना से हार गई थी पर 13 कुमाऊँ चालीॅ के 123 योद्धा ने यहाँ विजय प्राप्त की ओर यहां चीनीओ को एक क़दम भी आगे नही बढने दीया !
ये 123 योद्धा यहां न होते तो हमारा ओर थोडा हिस्सा चाइना के कब्जे मे होता !
उस समय लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटी रेजांग ला मे तापमान -40 डिग्री था , जिसमे सांस लेना भी दुर्लभ था , भारतीय सैनिको के पास ऐसी कोई सुविधा मौजूद नहीं थी जिससे की उन दुर्गुन स्थितियो का सामना किया जा सके !
ग्रेनेड बम गोले हथियार के नाम पर गिनती के अभ्यस्त अस्त्र –शस्त्र थे , दूसरी तरफ चीन के सैनिक लड़ाके उस मौसम के अनुकूलित थे ,उनके पास अत्याधुनिक हथियार के साथ साथ पहाड़ो पर लड़ने चलने के अभ्यस्त भी थे !
सबसे प्रमुख बात ये थी की इस सेक्टर पर हमारे मात्र 123 जवान ही मौजूद थे ,जबकि दूसरे तरफ
चीन के हजारो सैनिक , स्थिति का आकलन आप स्वयम कर सकते है !
18 नवंबर 1962 को लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटी पर शहादत का ऐसा इतिहास लिखा था, जिसे
कभी भुलाया नहीं जा सकता , यह यहां के यादव वीरों के जज्बे का ही परिणाम था, जिसके चलते चीन सीज फायर के लिए मजबूर हो गया था !
बेशक भारत को इस युद्ध में अधिकारिक रूप से जीत नसीब नहीं हुई , परंतु सामरिक दृष्टि से सर्वाधिक
महत्वपूर्ण मानी जाने वाली रेजांग ला पोस्ट पर यहां के जांबाज जवानों ने 1700 चीनी सैनिकों को मार गिराया था !
रेजांगला पोस्ट पर वर्ष 1962 की इस लड़ाई में तत्कालीन 13 कुमाऊं बटालियन के कुल 123 जवान शामिल थे , जिनमें से 114 शहीद हो गये थे , 114 जवानो ने तमाम असुविधा अभाव के बाद भी 1700 चिनियों को मार गिराया !
-40 डिग्री तापमान मे ही 18 नवंबर को चार बजे युद्ध शुरू हो गया। नजदीक की दूसरी पहाडियो पर मोर्चा संभाल रहे अन्य
सैनिकों को रेजांगला पोस्ट पर चल रहे इस ऐतिहासिक युद्ध की जानकारी तक नहीं थी !
लद्दाख की बर्फीली, दुर्गम व 18 हजार फुट ऊंची इस पोस्ट पर सूर्योदय से पूर्व हुए इस युद्ध में
यहां के वीरों की वीरता देखकर
चीनी सेना कांप उठी !
युद्ध मे 114 जवान शहीद हुए चीन के करीब 1700 जवानो को रेजांग ला के वीरों ने मार गिराया , तत्कालीन लड़ाई मे मात्र रेजांग ला पोस्ट मे ही चिनियों ने पीठ दिखाई थी !
इस लड़ाई के बाद रेजांग ला पोस्ट पर दिखाई वीरता का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने कंपनी कंमाडर मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत
देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार पदक परमवीर चक्र से अलंकृत किया था तथा इसी बटालियन के आठ अन्य जवानों को वीर चक्र, चार को सेना मैडल व एक को मैंशन इन डिस्पेच का सम्मान दिया था।
कंपनी कंमाडर मेजर शैतान सिंह सहित कंपनी के 114 जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए रणखेत हुए जो जवान जिंदा रह गए उनके शरीर पर अनेकों घाव थे। अपने जीते जी दुश्मन को एक इंच जमीन पर कदम न रखने देने वाले इन अमर शहीदों में 62 हरियाणा की वीर भूमि के लाल थे, 25 राजपूताना राजस्थान के शूरमा और 24 देश की नब्ज कहे जाने वाले उत्तरप्रदेश प्रांत से। एक रणबांकुरा बिहार से, एक रणबांकुरा मध्यप्रदेश से व एक सफाई कर्मचारी पंजाब से था।
चीन के पीकिंग रेडियो स्टेशन से भी हमारे इन रणबांकुरे जवानों की मार का उस वक्त जिक्र हुआ तथा सम्मान के रूप में हमारे महाबली योद्धाओं के शवों के पास चीनी सैनिकों ने मोर्चों पर भी राइफल उल्टी गाड़कर उनकी टोपी रखी हुई थी।
दुनिया के इतिहास में किसी भी एक मोर्चे पर इतनी बहादुरी से लड़ते हुए दुश्मन की भारी तबाही कर पूरी कंपनी का शहीद हो जाना, दूसरी कोई मिसाल नहीं है। सी कंपनी का नाम रेजांगला रखा गया तथा बटालियन को रेजांगला युद्ध सम्मान से विभूषित किया गया।
कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह भाटी राजपूत, नर्सिंग सहायक धर्मपाल दहिया जाट, रामनाई, श्योराम कुक बावरिया तथा दो सफाई कर्मचारियों रामफल और बहार के अलावा कंपनी के बाकी सभी शहीद अहीर जवान थे। अहीर जाति के इस बेमिसाल पराक्रम को देखते बाद में कुमाऊं रेजीमेंट की एक और बटालियन 11 कुमाऊं विशुद्ध रूप से अहीर जवानों के लिए खड़ी की गई।
कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह भाटी राजपूत, नर्सिंग सहायक धर्मपाल दहिया जाट, रामनाई, श्योराम कुक बावरिया तथा दो सफाई कर्मचारियों रामफल और बहार के अलावा कंपनी के बाकी सभी शहीद अहीर जाति के जवान थे।
इन्हें किया गया वीरता पुरस्कार से सम्मानित
कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह भाटी को मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। सूरजाराम, हरिराम, नायक गुलाब सिंह, हुकम चंद, सिंहराम, नर्सिंग अर्दली, धर्मपाल दहिया को मरणोपरांत तथा कप्तान राम कुमार और कप्तान रामचंद्र को घायल उपरांत वीर चक्र, सीएचएम हरफूल सिंह मरणोपरांत, कप्तान फूल सिह, सुबेदार जयनारायण, और कप्तान निहाल सिंह समेत 8 जवानों को सेना मेडल तथा बिग्रेडियर आरवी जटार को पेंशन इन डिस्पेच ओर 13 कुमाऊं के सीओ कर्नल एचएस धींगरा को अति विशिष्ट सेवा पदक प्रदान किया गया !
इसके अलावा 13 कुमायूं के सीओ को एवीएसएम से अलंकृत किया गया था !
भारतीय सेना के इतिहास में किसी एक बटालियन को एक साथ बहादुरी के इतने पदक अब तक कभी नहीं मिले !
1962 युद्ध मे चीन से भारत की करारी हार का सबसे बड़ा कारण
भारत में बनी 303 राइफल थी जिसका वजन भी खूब ज्यादा था और जिसे हर राउंड के बाद मैन्युअल तरीके से कारतूस लोड करनी पडती थी और सिर्फ तीस राउंड फायरिंग
के बाद उनका बैरल गर्म होकर लाल हो जाता था !
इस दिन दीपावली थी इसलिए प्रदीप जी ने लिखा है
जब देश में थी दीवाली
वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में
वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो आपने
थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी
ओर आगे लिखा
थी खून से लथ पथ काया
फिर भी बन्दूक उठाके
दस -दस को एक ने मारा
फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त समय आया तो
कह गये के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारों
अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने
क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी
तुम भूल न जाओ उनको
इस लिये कही ये कहानी
जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी
ए मेरे वतन के लोगों यह गीत 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में लता जी ने सबसे पहले गाया था !
( संकलन : आहिर भूपत भाई जळु )
जय अमर जवान जय हिन्द
जय हिन्द की सेना !